पूजा करते समय आंसू क्यों आते है

पूजा पाठ करते समय आंखों में आंसू क्यों आते हैं

पूजा पाठ करते समय आंखों में आंसू आना
पूजा करते समय आंसू क्यों आते है

पूजा करते समय आंसू क्यों आते है puja karte samay aansu kyon aata hai

बहुत बार आपके जीवन में ऐसा जरूर हुआ होगा। जब आप पूजा करते होंगे, या आप जब ध्यान करते है , जप करते है , या सच्चे दिल से भगवान को याद करते होंगे, तो आपके आँखो में आंसू जरूर आया होगा। मनुष्य के आँखो आंसू दो ही कंडीशन में आते है।  एक बहुत ज्यादा खुशी में या दुःख में आंसू निकला जाता है। जब कोई मनुष्य रोता है , तो उसका दुःख काम होता है , अपने मन को पहले से हल्का महसूस करता है। अर्थात नकारत्मक मनोवतियों नकारत्मक ऊर्र्जा के रूप में हमारे शरीर से रिलीज़ होता है।  और हमारे दुखों का नाश होता है।

हमारा शरीर भी पंचमाहभूततत्त्व से मिलकर बना हुआ है , और यह सभी तत्व ब्रह्मांड में मौजूदा है। पूरे ब्रह्मांड का निर्माण ऊर्र्जा( energy ) और द्रव्यमान (mass) के अणु और परमाणु से हुआ है। तो हम और हमारा शरीर ब्रह्मांड से अलग नहीं है। जैसे दो परमाणु द्रव्यमान और ऊर्जा से बांधे हुए होते है।  वैसा ही हमारा शरीर भी बना हुआ है। हमारे शरीर में पांच तत्व अग्नि , वायु , जल , पृथ्वी और आकाश के परमाणु, ऊर्जा और द्रव्यमान के रूप में शामिल है , वैसे ही ब्रह्मांड में यह सभी तत्व उपस्थित है। हमारे शरीर में पांच तत्व के अलावा बुद्धि और आत्म भी है। वैसे ही इस ब्रह्मांड को बनाने वाला कोई पराशक्ति भी है। जिसे हम भगवान , ईशवर के नाम से जानते है। इस ब्रह्मांड में नकारत्मक और सकारत्मक ऊर्जा दोनों उपस्थित है , वैसे ही हमरे शरीर में इन ऊर्जा का एक साथ उपस्थित होना है। जब हम ध्यान पूजा , जप , साधना करते है , तो हम अपने पांच इंद्रियों , बुद्धि का उपयोग करे के आत्मा के मध्यं से ऊर्जा को रिलीज़ करते है , तो तरंग के मध्यं से उस पराशक्ति ( ईशवर, भगवान ) के सकारत्मक तरंग के साथ मिल जाता है। जिसे हमरे अंदर आनंद , खुशी ,सकारत्मक आभामंडल ,चेहरे में चमक उतपन्न होता है , जिसे हमरे समस्या ,रोग ,दुःख दूर होते है। और हमरे अंदर भरी हुई नकारत्मक धीरे धीरे ऊर्जा आशु के रूप में बाहर निकलने लगते है। जिसे हमारी आत्मा, बुद्धि ,इन्द्रियों निर्मल होती है। हमारे आत्मा बुद्धि और इंद्रियों का शुद्दिकरण होता है। और हम उस परमात्मा से जुड़ा जाते है , उस पमात्मा से हमें बहुत सकात्मक संकेत मिलना शुरू हो जाता है।

लेकिन जब हम किसी मंत्रो का जाप करते है , उदारहण के तौर पर जैसे गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र ,या राम, कृष्ण का नाम बार बार शुद्ध मन से ध्यान , जप करते है , तो यह प्रकिया और तेजा हो जाता है। क्योंकी मंत्र ऊर्जा का समहू है। मंत्र तरंगो को और अधिक मजबूत करता है। और हमारे आत्मा से निकलने वाले तरंगो को परमत्मा के तरंगो से जोड़ता है, जिसे हमारे आत्मा में प्रकाश बढ़ने लगता है, जो हमरे अंदर आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारत्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। जिसे अंदर अपने इष्ट ,अपने भगवान, गुरु पर विश्वाश बढ़ाता है। जिसे हमारे इन्द्रियों, बुद्धि का शुद्दिकरण तेजी से होने लगता है। जिसे हमारी आत्मा में प्रकाश फलता है, जिसके कारण हमरे शरीर में फैला हुआ अशुद्वि इन्द्रियों के मध्यं से शरीर से बाहर निकलता है। उन्ही इन्द्रियों में से एक है आँख, जिसे आशु के माध्यम से अशुद्वि निकलता है। और हमरे अन्तकरण को शुद्ध करता है।  यह शुद्धिकरण , हमें लोगो से अलग बनता है , हमारे आसपास कुछ घटना होती है जैसे दीपका के लौ का अधिक जलाना , अधिक चमकना, अगरबत्ती का धुँवा भगवान की ओर जाना, शरीर में खून के बहाने की आवाज सुनाई देना, ब्रम्हांड के अजीब आवाज सुनाई देना, प्रकृति के द्वुवारा संकेत देना, पशुपक्षी की अच्छी घटना ,आकाश में बादलों के रूप में कुछ दिख जाना, पूजा का फूल गिरना, अच्छी खुश्बू आना, चहरे में चमक , दिव्य अनुभूति , आपके बोलने से घटना का सच में होना , आतंरिक खुशी, सकारत्मक ऊर्जा का बढ़ाना, मन प्रसन्ना रहना, सहसा का बढ़ाना बहुत सारे दिव्य घाटना घटाने लगते है।

लेकिन सभी मनुष्यों को एक सामान फल नहीं मिलता है , ऐसा क्यों होता है ?

भगवान ने भागवत गीता के मध्य से अध्यय 7  में बताया है।

कई हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है। और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पता है। 

अर्थात सभी मनुष्यों की पूजा भक्ति करने की अपनी सीमा होती है , पूरी तरह से निश्छल भक्ति , शुद्धा भक्ति करना हर मनुष्य के लिए संभव नहीं होता है।  इस कारण आप जितना भक्ति करते है , पूजा करते है उसी के अनरूप आपको सिद्धि मिलता है। आपको फल मिलता है। 

लेकिन इसी समय, आपका का ईश्वर से अच्छा कनेक्शन होता है, क्योकि आप अपने आत्मा के माध्यम से बार बार ईश्वर को तरंग भेजते रहते है। तो ईश्वर आपकी इच्छा की पूर्ति का सकते देता है , ईश्वर आप सहयोग भी करता है। आपको कई सिद्ध भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देता है।  ऐसे समय में आपको अपने इष्ट और अर्ध्य का अधिक ध्यान करना चाहिए। अपने नकारत्मक मनोवृतियों (ईर्ष्या, दुवेश ,गलत कार्य ) जो जल्द से जल्द त्यागन चाहिए। शुद्धचित्त होकर भगवान की भक्ति अधिक से अधिक करना चाहिए। इसे भगवान से मिलने वाला आशीर्वाद, फल, संकेत, प्रेम  कई गुना बड़ा जाता है।

जो जीवा भगवान की निर्मल, शुद्ध भक्ति करता है। भगवान उसका साथ देता है।  उसको अपना चमत्कार दिखना शुरू कर देता है।

भगवान ने भागवत गीता के मध्य से अध्यय 9  में बताया है।

भगवान कहते है।

यदि कोई जीव मुझे प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे फूल पत्र , फल ,जल या किसी अन्य वस्तु को प्रदान करता है तो मै उसे स्वीकार करता हु।

और जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरंतर मेरी पूजा करते है , उसकी जो आवश्यक्ताए होती है , उन्हें मै पूरा करता हु , और जो कुछ उनके पास है ,उनकी रक्षा करता हु।

ईश्वर आप सब का भला करे

धन्यवाद।

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